Saturday, June 13, 2026
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खेत बचाओ अभियान के तहत किसानों को मृदा परीक्षण और संतुलित उर्वरक उपयोग के प्रति किया गया जागरूक

संगरूर, 9 जून। पंजाब कृषि विश्वविद्यालय (पीएयू) के कृषि विज्ञान केंद्र (केवीके), संगरूर द्वारा ‘खेत बचाओ अभियान’ के तहत गांवों में जागरूकता शिविर, किसान गोष्ठियां और नुक्कड़ बैठकों का आयोजन किया जा रहा है। अभियान का उद्देश्य किसानों को मिट्टी की सेहत सुधारने तथा उर्वरकों के संतुलित उपयोग के प्रति जागरूक करना है।

केवीके संगरूर के प्रभारी डॉ. मनदीप सिंह ने बताया कि पीएयू लुधियाना के निदेशक प्रसार शिक्षा तथा आईसीएआर-अटारी, जोन-1, लुधियाना के दिशा-निर्देशों के तहत चलाए जा रहे इस अभियान के दौरान टीम ने 14 से अधिक गांवों में पहुंचकर लगभग 1500 किसानों को मृदा परीक्षण आधारित उर्वरक प्रबंधन, हरी खाद, जैव उर्वरकों के उपयोग तथा फसल अवशेषों के वैज्ञानिक प्रबंधन संबंधी जानकारी दी है।

गांव तुंगा और बिगड़वाल में आयोजित शिविरों के दौरान डॉ. रुकिंदरप्रीत सिंह, सहायक प्रोफेसर (फसल विज्ञान), ने किसानों को सलाह दी कि वे मृदा परीक्षण रिपोर्ट के आधार पर ही नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश तथा सूक्ष्म पोषक तत्वों का प्रयोग करें। उन्होंने बताया कि यदि गेहूं की फसल में डीएपी उर्वरक की अनुशंसित मात्रा का प्रयोग किया गया है तो खरीफ सीजन में धान और बासमती के लिए अतिरिक्त फास्फोरस उर्वरक डालने की आवश्यकता नहीं होती।

उन्होंने धान की नर्सरी में जिंक और लौह तत्व की कमी की पहचान तथा उसके समाधान के उपायों की जानकारी भी किसानों को दी। इसके अलावा धान में खरपतवार प्रबंधन संबंधी वैज्ञानिक तकनीकों पर भी विस्तार से चर्चा की।

इस अवसर पर डॉ. सुनील कुमार, सहायक प्रोफेसर (फार्म मशीनरी), ने किसानों को फसल अवशेषों को खेत में ही मिलाकर मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने धान की मशीन से रोपाई के लिए मैट टाइप नर्सरी तैयार करने तथा यांत्रिक रोपाई की विधि के बारे में भी जानकारी दी।

डॉ. गुरबीर कौर, सहायक प्रोफेसर (पौध संरक्षण), ने किसानों को धान और बासमती के बीज उपचार, नर्सरी एवं फसल में रोगों की रोकथाम के उपायों की जानकारी दी। उन्होंने बासमती में झंडा रोग की रोकथाम के लिए बीज उपचार के साथ-साथ नर्सरी की जड़ों के उपचार पर भी विशेष जोर दिया।

कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिकों ने किसानों से अपील की कि वे वैज्ञानिक खेती तकनीकों को अपनाएं और मिट्टी की सेहत बनाए रखने के लिए नियमित रूप से मृदा परीक्षण करवाएं, ताकि उत्पादन लागत कम होने के साथ-साथ फसलों की उत्पादकता भी बढ़ाई जा सके।

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