रोहतक (हरियाणा): अक्सर कहा जाता है कि उम्र केवल एक संख्या है, और इस बात को हरियाणा के रोहतक जिले के मोखरा गांव की रहने वाली वीरमती देवी ने सच कर दिखाया है। 65 वर्ष की आयु में 81 पदक जीतकर उन्होंने यह साबित कर दिया है कि अगर मन में जज्बा हो, तो सफलता की कोई एक्सपायरी डेट नहीं होती।
प्रिंसिपल की कुर्सी से ट्रैक के मैदान तक
वीरमती देवी की कहानी किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं है। वे एक सरकारी सीनियर सेकेंडरी स्कूल में प्रिंसिपल (प्राचार्य) के पद पर कार्यरत थीं। जीवन का एक बड़ा हिस्सा शिक्षा और अनुशासन को समर्पित करने के बाद, जब लोग 58 साल की उम्र में सेवानिवृत्ति (रिटायरमेंट) के बाद आराम की योजना बनाते हैं, तब वीरमती ने ट्रैक पर दौड़ने का फैसला किया।
58 की उम्र में हुई ‘नई शुरुआत’
उन्होंने 58 वर्ष की आयु में खेलों की दुनिया में कदम रखा। खुद को फिट रखने के उद्देश्य से शुरू हुआ यह सफर जल्द ही पदकों की गूँज में बदल गया। उन्होंने एथलेटिक्स की विभिन्न स्पर्धाओं, विशेषकर दौड़ में हिस्सा लेना शुरू किया और अपनी मेहनत के दम पर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई।
उपलब्धियों का अंबार: 81 पदक
वीरमती देवी ने अब तक विभिन्न मास्टर्स एथलेटिक्स चैंपियनशिप में कुल 81 पदक अपने नाम किए हैं। इनमें से कई पदक अंतरराष्ट्रीय स्तर के हैं, जहाँ उन्होंने दुनिया भर के वरिष्ठ खिलाड़ियों को पछाड़कर तिरंगा लहराया है।
-
अनुशासन: उनकी सफलता के पीछे कड़ी मेहनत और सख्त अनुशासन है।
-
मिसाल: मोखरा गांव की यह ‘धाकड़ दादी’ आज पूरे हरियाणा में चर्चा का विषय बनी हुई हैं।
समाज के लिए संदेश
वीरमती देवी की यह उपलब्धि समाज के उन लोगों के लिए एक कड़ा संदेश है जो बढ़ती उम्र को बाधा मानते हैं। उनकी कहानी सिखाती है कि रिटायरमेंट जीवन का अंत नहीं, बल्कि एक नई पारी की शुरुआत हो सकती है। आज वे न केवल अपने गांव बल्कि पूरे देश की महिलाओं और बुजुर्गों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गई हैं।






