नई दिल्ली, 04 अप्रैल 2026: देश के पांच राज्यों में चल रहे विधानसभा चुनावों का प्रचार अपने चरम पर पहुंच गया है। सभी राजनीतिक दल जोर-शोर से जनता के बीच पहुंच रहे हैं, लेकिन इस बार चुनावी माहौल में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। विकास के पारंपरिक मुद्दों की जगह अब भावनात्मक मुद्दे और स्थानीय अस्मिता की राजनीति केंद्र में आ गई है।
असम, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और केरल जैसे राज्यों में चुनावी बहस अब सड़क, रोजगार और विकास से हटकर पहचान, संस्कृति और क्षेत्रीय गौरव पर केंद्रित हो गई है। हर राज्य में मुद्दे भले अलग-अलग नजर आते हों, लेकिन मूल कहानी ‘पहचान की राजनीति’ की ही है।
पश्चिम बंगाल: पहचान बनाम पहचान की लड़ाई
पश्चिम बंगाल में इस बार चुनावी मुद्दा विकास नहीं, बल्कि पहचान बनाम पहचान बन गया है। पिछले 15 वर्षों के कामकाज को पीछे छोड़कर अब राष्ट्रवाद, धर्म और क्षेत्रीय अस्मिता जैसे मुद्दे प्रमुख हो गए हैं।
बीजेपी जहां बहुसंख्यक वोटों को साधने के लिए सीमा सुरक्षा, घुसपैठ और जनसांख्यिकीय बदलाव जैसे मुद्दे उठा रही है, वहीं दूसरी ओर ममता बनर्जी बंगाल की संस्कृति, भाषा और खान-पान पर खतरे की बात कर रही हैं।
असम: घुसपैठ और यूसीसी पर सियासत
असम में भी चुनावी बहस घुसपैठ और समान नागरिक संहिता (UCC) के इर्द-गिर्द घूम रही है। मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा घुसपैठियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई और असमिया अस्मिता की रक्षा की बात कर रहे हैं।
वहीं कांग्रेस इन बयानों को मुद्दा बनाकर इसे राज्य की संस्कृति और सामाजिक ताने-बाने पर हमला बता रही है।
तमिलनाडु: हिंदुत्व बनाम द्रविड़ पहचान
तमिलनाडु में चुनाव हिंदुत्व और द्रविड़ पहचान के बीच सिमटता नजर आ रहा है। डीएमके जहां भाषा और क्षेत्रीय संस्कृति को लेकर जनता को जोड़ रही है, वहीं बीजेपी हिंदुत्व के मुद्दे के साथ चुनावी मैदान में है।
केरल: संस्कृति और धर्म की सॉफ्ट पॉलिटिक्स
केरल में भी चुनावी माहौल में धर्म और संस्कृति का प्रभाव साफ दिखाई दे रहा है। सबरीमाला मंदिर से जुड़े मुद्दे और सांस्कृतिक पहचान को लेकर सभी प्रमुख दल—बीजेपी, कांग्रेस और वामपंथी—अपनी-अपनी रणनीति के तहत जनता को साधने में जुटे हैं।
दिलचस्प हुआ चुनावी मुकाबला
कुल मिलाकर इन चुनावों में राज्य भले अलग हों, लेकिन राजनीतिक दलों की रणनीति काफी हद तक समान दिख रही है—अस्मिता, संस्कृति और भावनाओं के मुद्दों पर जोर।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि जनता विकास के वादों पर भरोसा करेगी या भावनात्मक अपीलों पर। इसका जवाब 4 मई को आने वाले चुनाव परिणामों में मिलेगा।






