कोटि–कोटि कंठों की भाषा, जन–गण की मुखरित अभिलाषा
हिंदी है पहचान हमारी, हिंदी हम सबकी परिभाषा ।।
किसी भी राष्ट्र की पहचान उसकी राष्ट्रभाषा से होती है। स्वतंत्रता-प्राप्ति के पश्चात हिंदी ने अपनी विकास यात्रा के पचास वर्ष पूरे कर लिए है और इन पचास वर्षों में हिंदी ने देश में ही नहीं विदेशों में भी अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। भारत एक बहुभाषा-भाषी राष्ट्र है। विभिन्न भाषा-भाषी उसकी सीमाओं में निवास करते हैं। हिंदी की व्यापकता और उसकी परंपरागत स्थिति को देखते हुए हिंदी को राष्ट्रभाषा की गरिमा प्रदान की गई है।
हिंदी ने पिछले पचास वर्षों में अत्यधिक विकास किया है। अहिंदी क्षेत्रों में हिंदी की लोकप्रियता एवं प्रयोग बढ़ा है। बहुभाषी राष्ट्र होने के नाते हमारे देश में अनेक भाषाएँ बोली जाती हैं, अतः संविधान ने हिंदी सहित बाईस भाषाओं को मान्यता प्रदान की है। हिंदी भारत के छह राज्यों की राजभाषा है तथा अहिंदी-भाषी क्षेत्रों में यह संपर्क भाषा है। इसकी व्यापकता को देखते हुए इसे राष्ट्रभाषा का महत्त्वपूर्ण पद प्रदान किया गया है।
आज हिंदी विशाल भारत की अधिकांश जनता की हृदय स्थली को स्पर्श करने एवं जोड़ने वाली भाषा के रूप में निरंतर विकास मार्ग पर अग्रसर है। हिंदी में राष्ट्रभाषा होने के सभी महत्त्वपूर्ण गुण विद्यमान है। हिंदी अत्यंत समृद्धशाली भाषा है। इसका शब्द भंडार विशाल है। धर्म, दर्शन, साहित्य, संस्कृति, विज्ञान जैसे विषयों को अभिव्यक्त करने की क्षमता हिंदी में है। यह एक सरल, सहज एवं वैज्ञानिक भाषा है, जिसे आसानी से सीखा जा सकता है। हिंदी में विकास की अनेक संभावनाएँ हैं।
स्वागत करती हिंदी सबका, बिखरा कुमकुम रोली,
भारत जाई भाषा, अपनी जननी अपनी बोली।
स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हिंदी की स्थिति निरंतर मजबूत हुई है। “विश्व के लगभग 37 देशों के 109 विश्वविद्यालयों/संस्थानों में हिंदी के पठन-पाठन की व्यवस्था है। लगभग 48 देशों में हिंदी के जानकार बड़ी संख्या में हैं।“ अतः अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी हिंदी की लोकप्रियता बढ़ी है। ‘युनिवर्सिटी ऑफ वाशिंगटन ने 1982 के आँकड़ों के आधार पर विश्व में हिंदी की स्थिति प्रथम बताई है।
वर्तमान समय में हिंदी की स्थिति पर विचार करें तो इसका व्यावहारिक रूप अधिक विकसित दिखाई देता है। आवश्यकता यह है कि हिंदी को काम-काज की भाषा के रूप में भी अपनाया जाए। अंतर्राष्ट्रीय विश्व हिंदी सम्मेलनों की लोकप्रियता एवं सफलता से स्पष्ट है कि हिंदी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनाई जा रही है।
निज भाषा उन्नति लहै सब उन्नति को मूल।
बिन निज भाषा ज्ञान के मिटै न हिय को शूल।।
तमिलनाडु प्रदेश को छोड़कर देश के प्रायः सभी प्रांतों में हिंदी पढ़ी-पढ़ाई जाती है। हम अपने दैनिक जीवन में हिंदी का अधिक-से-अधिक प्रयोग करें तभी हिंदी की स्थिति सुधर सकती है। मात्र मुट्ठी भर लोग चाल अंग्रेजी को गले से चिपकाए रहें और विरोधी दृष्टिकोण बनाए रहें परंतु हिंदी अपनी विकास यात्रा में निरंतर उन्नति के शिखर पर अग्रसर होती रहेगी, बशर्ते कि हमारे संकल्प क्षीण न हों।
हिंदी आज चाहती हमसे,
हम निश्छल अंतस्थल से।
सहज विनम्र अथक यत्नों से,
माँगें न्याय आज से, कल से।
-रंजना






