नई दिल्ली, 2 जून 2026: सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि अनुकंपा नियुक्ति (Compassionate Appointment) के मामलों में विवाहित बेटियों को परिवार की परिभाषा से बाहर नहीं रखा जा सकता। अदालत ने उत्तर प्रदेश सरकार के वर्ष 2019 के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें विवाहित बेटियों को इस अधिकार से वंचित किया गया था।
न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की पीठ ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को पलटते हुए कहा कि ऐसी पाबंदी संविधान के मूल सिद्धांतों के विपरीत है। अदालत ने स्पष्ट किया कि अनुकंपा नियुक्ति के लिए निर्भरता, आर्थिक आवश्यकता और पात्रता ही प्रमुख मानदंड हैं। किसी व्यक्ति की वैवाहिक स्थिति का इन आधारों से कोई तार्किक संबंध नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट ने लैंगिक भेदभाव और रूढ़िवादी सोच पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि यह मान लेना कि विवाह के बाद बेटी अपने मायके के परिवार की सदस्य नहीं रहती, संवैधानिक रूप से स्वीकार्य नहीं है। अदालत ने कहा कि विवाह न तो बेटी और उसके परिवार के रिश्ते को समाप्त करता है और न ही यह साबित करता है कि वह परिवार पर निर्भर नहीं है।
पीठ ने कहा कि यदि आश्रित पुत्रों को अनुकंपा नियुक्ति का लाभ दिया जा सकता है, तो केवल विवाहित होने के आधार पर बेटियों को इससे वंचित करना समानता के अधिकार का उल्लंघन है।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को महिलाओं के अधिकारों और लैंगिक समानता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। इससे देशभर में अनुकंपा नियुक्ति से जुड़े मामलों पर व्यापक प्रभाव पड़ने की संभावना है।