Saturday, June 6, 2026
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पंजाब कृषि विश्वविद्यालय की अनुशंसित धान किस्मों और संतुलित खाद उपयोग से ही घटेगी लागत और बढ़ेगा मुनाफा: डॉ. अशोक कुमार गर्ग

पी.ए.यू.-फार्म सलाहकार सेवा केंद्र, संगरूर द्वारा गांव हेड़ीके में किसान गोष्ठी आयोजित

शेरपुर, 22 मई,2026: पंजाब कृषि विश्वविद्यालय, लुधियाना के दिशा-निर्देशों के तहत फार्म सलाहकार सेवा केंद्र (एफ.ए.एस.सी.) संगरूर द्वारा गांव हेड़ीके में धान और बासमती की अनुशंसित किस्मों, मिट्टी परीक्षण आधारित खाद प्रबंधन तथा फास्फोरस खाद के उचित उपयोग संबंधी किसान गोष्ठी आयोजित की गई।

किसानों को संबोधित करते हुए वरिष्ठ प्रसार वैज्ञानिक डॉ. अशोक कुमार गर्ग ने कहा कि खादों का अंधाधुंध उपयोग न केवल खेती की लागत बढ़ाता है, बल्कि मिट्टी की उर्वरता और पर्यावरण के लिए भी नुकसानदायक सिद्ध होता है। उन्होंने किसानों से मिट्टी परीक्षण के आधार पर ही खादों का उपयोग करने की अपील करते हुए कहा कि संतुलित खाद प्रबंधन से कम खर्च में बेहतर पैदावार प्राप्त की जा सकती है।

डॉ. गर्ग ने मौके पर स्वयं मिट्टी के नमूने लेकर किसानों को सही विधि की जानकारी दी। उन्होंने धान और बासमती में डी.ए.पी. के अनावश्यक उपयोग से बचने तथा यूरिया का सीमित और संतुलित प्रयोग करने पर जोर दिया। उन्होंने विशेष रूप से कद्दू करने से पहले यूरिया डालने की प्रथा से बचने की सलाह दी।

उन्होंने बताया कि धान में जिंक की कमी को केवल अनुशंसित मात्रा के अनुसार ही पूरा किया जाना चाहिए।

इसके अलावा धान की पौध में लगाए जाने वाले जैविक खाद (एजोस्पाइरलम) टीके की महत्ता के बारे में जानकारी देते हुए उन्होंने कहा कि यह जैविक टीका फसल की पैदावार बढ़ाने के साथ-साथ मिट्टी की जैविक सेहत सुधारने में भी अहम भूमिका निभाता है।

कैंप के दौरान हरी खादों जैसे जंतर और सनई की खेती के लाभों के बारे में भी विस्तार से जानकारी दी गई। डॉ. गर्ग ने धान की नर्सरी में लगने वाले बौने पौध रोग की पहचान और रोकथाम संबंधी सिफारिशें साझा करते हुए किसानों को नर्सरी की नियमित निगरानी करने के लिए प्रेरित किया।

उन्होंने पंजाब कृषि विश्वविद्यालय द्वारा अनुशंसित धान की किस्मों पी.आर. 131, पी.आर. 128, पी.आर. 126 और नई किस्म पी.आर. 133 के बारे में विस्तारपूर्वक जानकारी दी। उन्होंने बताया कि पी.आर. 133 किस्म रोपाई के लगभग 111 दिनों में पक जाती है और प्रति एकड़ लगभग 30.5 क्विंटल उत्पादन देने की क्षमता रखती है।

बासमती की प्रसिद्ध किस्मों पूसा बासमती 1509 और पूसा बासमती 1847 में खाद प्रबंधन तथा झंडा रोग से बचाव के लिए बीज उपचार संबंधी जानकारी भी दी गई।

इस अवसर पर किसानों को पंजाब कृषि विश्वविद्यालय, लुधियाना द्वारा चलाए जा रहे विभिन्न कोर्सों के बारे में भी अवगत कराया गया तथा ग्रामीण विद्यार्थियों को कृषि शिक्षा की ओर प्रेरित किया गया।

कैंप के आयोजन में सरदार रविंदर सिंह, सरदार जसपाल सिंह, सरदार कुलदीप सिंह (सचिव), सरदार अजयपाल सिंह तथा सरदार गगनदीप सिंह ने विशेष योगदान दिया।

कैंप के दौरान पंजाब कृषि विश्वविद्यालय द्वारा अनुशंसित पी.आर. 126 के बीज, एजोस्पाइरलम, पशुओं के लिए मिनरल मिश्रण, बायपास फैट, प्रीमिक्स तथा कृषि साहित्य की बिक्री भी की गई।

किसानों द्वारा पूछे गए विभिन्न कृषि संबंधी प्रश्नों के वैज्ञानिक और व्यवस्थित ढंग से उत्तर दिए गए। किसानों ने मिट्टी परीक्षण करवाने और अनुशंसित खाद प्रबंधन अपनाने में गहरी रुचि दिखाई।

अंत में किसानों को खेत में ही मिट्टी के नमूने लेने की सही विधि के बारे में जानकारी देकर नमूने एकत्र किए गए। इसके उपरांत फार्म सलाहकार सेवा केंद्र, संगरूर की टीम ने सरदार रविंदर सिंह द्वारा बोई गई 6 एकड़ मूंग की फसल का दौरा कर फसल की स्थिति का जायजा भी लिया।

 

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