चंडीगढ़, 11 मई 2026: पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने करोड़ों रुपये के कथित IDFC फर्स्ट बैंक धोखाधड़ी मामले में सोमवार को चंडीगढ़ पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए। अदालत ने पूछा कि जब मामले की जांच आधिकारिक रूप से सीबीआई (CBI) को सौंप दी गई थी, तब चंडीगढ़ पुलिस बैंकों को फ्रीज खातों से प्रतिबंध हटाने के लिए पत्र क्यों भेज रही थी।
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट की बेंच ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि 27 अप्रैल को जांच सीबीआई को ट्रांसफर किए जाने के बाद यूटी प्रशासन या चंडीगढ़ पुलिस के पास बैंकों को निर्देश जारी करने का अधिकार कैसे बचता है। अदालत ने कहा, “यदि जांच सीबीआई के पास है, तो यूटी प्रशासन इन खातों के संबंध में पत्र जारी करने की शक्ति कहां से ला रहा है?”
क्या है पूरा मामला?
बैंक की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता रणदीप राय और रुबीना विरमानी ने अदालत को बताया कि गृह मंत्रालय (MHA) की मंजूरी के बाद चंडीगढ़ पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा (EOW) द्वारा दर्ज एफआईआर पहले ही सीबीआई को भेजी जा चुकी हैं। इसके बावजूद चंडीगढ़ पुलिस ने 2 मई और 8 मई को विभिन्न बैंकों को पत्र लिखकर उन खातों से ‘लियन’ हटाने को कहा, जिनके जरिए कथित धोखाधड़ी की रकम ट्रांसफर हुई थी।
अधिवक्ता रणदीप राय ने आरोप लगाया कि स्थानीय पुलिस “अत्यधिक उत्साह” दिखाते हुए इन खातों को खुलवाने की कोशिश कर रही है, जबकि जांच पर अब उसका कोई अधिकार नहीं है। उन्होंने अदालत को बताया कि यह लगभग 700 करोड़ रुपये का कथित घोटाला है, जिसमें 50 से 70 बैंक खाते शामिल हैं।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का भी दिया हवाला
सुनवाई के दौरान बैंक पक्ष ने साइबर धोखाधड़ी और डिजिटल गिरफ्तारी जैसे मामलों पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी हालिया दिशा-निर्देशों का भी हवाला दिया। वकीलों ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार, जांच एजेंसियों को साइबर अपराध से जुड़ी संदिग्ध रकम को फ्रीज करने का पूरा अधिकार है, ताकि पीड़ितों का पैसा सुरक्षित रखा जा सके।
हाईकोर्ट ने मांगा जवाब
हाईकोर्ट ने यूटी प्रशासन के वकील को निर्देश दिए हैं कि वे 27 अप्रैल के ट्रांसफर आदेश के बावजूद 2 मई और 8 मई को जारी किए गए पत्रों को लेकर स्पष्ट जवाब और निर्देश लेकर अदालत में पेश हों। अदालत ने स्पष्ट किया कि अब इस मामले की मुख्य जांच एजेंसी सीबीआई ही है।