चंडीगढ़ 2 जनवरी 2026 : पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने महिलाओं के प्रजनन अधिकारों को लेकर एक ऐतिहासिक और अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि किसी विवाहित महिला को गर्भपात कराने के लिए अपने पति की सहमति की आवश्यकता नहीं है। इस मामले में केवल महिला की इच्छा और सहमति ही सर्वोपरि मानी जाएगी।
यह याचिका पंजाब के फतेहगढ़ साहिब की 21 वर्षीय महिला द्वारा दायर की गई थी। महिला की शादी इसी वर्ष मई महीने में हुई थी, लेकिन पति के साथ संबंध तनावपूर्ण होने के कारण वह उससे अलग रह रही है। इस दौरान महिला गर्भवती हो गई। तलाक की प्रक्रिया चलने के कारण वह इस गर्भ को आगे नहीं बढ़ाना चाहती थी। जब उसने गर्भपात की मांग की तो यह कानूनी सवाल खड़ा हुआ कि क्या इसके लिए अलग रह रहे पति की अनुमति जरूरी है।
हाईकोर्ट के आदेश पर पीजीआईएमईआर, चंडीगढ़ के डॉक्टरों के एक मेडिकल बोर्ड ने महिला की जांच की। 23 दिसंबर को सौंपी गई रिपोर्ट में बताया गया कि महिला का गर्भ 16 सप्ताह और एक दिन का है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि तलाक की प्रक्रिया के चलते महिला पिछले छह महीनों से अवसाद (डिप्रेशन) से जूझ रही है। मेडिकल बोर्ड ने महिला को मानसिक रूप से गर्भपात के लिए सक्षम बताया।
जस्टिस सुवीर सहगल की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (एमटीपी) एक्ट के तहत 20 सप्ताह से कम अवधि के गर्भ को गिराने की अनुमति दी जा सकती है। अदालत ने टिप्पणी की कि एक विवाहित महिला यह तय करने की सबसे बेहतर निर्णायक है कि वह गर्भावस्था जारी रखना चाहती है या उसे समाप्त करना चाहती है। इसमें केवल महिला की सहमति और इच्छा ही मायने रखती है।
हाईकोर्ट ने महिला की याचिका स्वीकार करते हुए उसे अगले एक सप्ताह के भीतर गर्भपात कराने की अनुमति दे दी। यह फैसला महिलाओं के आत्मनिर्णय और अधिकारों की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।






