पटियाला: पार्क अस्पताल, पटियाला के डॉक्टरों की टीम ने शुक्रवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान क्रोनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (सीओपीडी) को लेकर फैक्ट्स और इससे जुड़े मिथकों पर विस्तार से जानकारी दी। इस मौके पर पल्मोनोलॉजी कंसल्टेंट डॉ. अपारजोत बराड़, इंटरनल मेडिसिन कंसल्टेंट डॉ. कमलदीप सिंह सोढ़ी, डॉ. बलविंदर कुमार, डॉ. अमरजीत सिंह और वाइस प्रेसिडेंट मेडिकल ऑपरेशंस डॉ. ब्रह्म प्रकाश मौजूद रहे।
डॉ. अपारजोत बराड़ ने कहा कि सीओपीडी दुनिया भर में हार्ट से जुड़ी बीमारियों और कैंसर के बाद तीसरा सबसे बड़ा जानलेवा रोग बन चुका है। उन्होंने बताया कि बड़ी संख्या में लोग सांस फूलने और खांसी जैसे लक्षणों को उम्र बढ़ने की सामान्य प्रक्रिया समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, जबकि यही लक्षण सीओपीडी के शुरुआती संकेत हो सकते हैं। शुरुआती अवस्था में बीमारी के लक्षण स्पष्ट नहीं होते, जिस कारण समय पर इसकी पहचान नहीं हो पाती।
इंटरनल मेडिसिन कंसल्टेंट डॉ. कमलदीप सिंह सोढ़ी ने बताया कि सीओपीडी कई वर्षों तक बिना गंभीर सांस की तकलीफ के रह सकता है, लेकिन जब बीमारी गंभीर स्तर पर पहुंच जाती है, तब इसके लक्षण स्पष्ट रूप से सामने आते हैं। सीओपीडी फेफड़ों की एक प्रगतिशील बीमारी है, जिसमें फेफड़ों में हवा के अंदर-बाहर जाने में रुकावट आ जाती है, जिससे सांस लेना मुश्किल हो जाता है।
उन्होंने बताया कि भारत में लगभग 6.3 करोड़ लोग सीओपीडी से पीड़ित हैं, जो दुनिया की कुल सीओपीडी आबादी का करीब 32 प्रतिशत है। डॉ. बलविंदर कुमार ने कहा कि सीओपीडी से होने वाली मौतों की संख्या एड्स, टीबी, मलेरिया और डायबिटीज जैसी बीमारियों से होने वाली मौतों से भी अधिक है। यह बीमारी मुख्य रूप से 40 वर्ष या उससे अधिक उम्र के लोगों में पाई जाती है, खासकर उन लोगों में जिनका धूम्रपान का इतिहास रहा है। भारत में सीओपीडी का प्रचलन 5.5 से 7.55 प्रतिशत के बीच है, जबकि हालिया अध्ययनों के अनुसार पुरुषों में इसका प्रसार 22 प्रतिशत और महिलाओं में 19 प्रतिशत तक पाया गया है।
डॉ. अमरजीत सिंह ने बताया कि सीओपीडी का कोई स्थायी इलाज नहीं है, लेकिन सही समय पर इलाज और जीवनशैली में बदलाव से बीमारी की गति को धीमा किया जा सकता है और मरीज की जीवन गुणवत्ता को बेहतर बनाया जा सकता है।
सीओपीडी को तीसरा सबसे बड़ा किलर क्यों कहा जाता है (औचित्य):
सीओपीडी को तीसरा सबसे बड़ा किलर इसलिए माना जाता है क्योंकि यह एक “साइलेंट किलर” की तरह धीरे-धीरे शरीर को नुकसान पहुंचाती है। इसके लक्षण लंबे समय तक नजरअंदाज होते रहते हैं और जब मरीज इलाज के लिए डॉक्टर के पास पहुंचता है, तब तक फेफड़ों को गंभीर क्षति हो चुकी होती है। धूम्रपान, प्रदूषण, घरेलू ईंधन के धुएं और बार-बार होने वाले श्वसन संक्रमण इसके प्रमुख कारण हैं। समय पर पहचान और इलाज न होने की वजह से यह बीमारी उच्च मृत्यु दर का कारण बनती है, इसी कारण हार्ट डिजीज और कैंसर के बाद इसे तीसरा सबसे जानलेवा रोग माना जाता है।
सीओपीडी के प्रमुख रिस्क फैक्टर:
बचपन में बार-बार सांस के संक्रमण
कोयले या लकड़ी से जलने वाले चूल्हों के धुएं के संपर्क में आना
सेकेंड-हैंड स्मोक
अस्थमा का इतिहास
फेफड़ों का पूर्ण विकास न होना
40 वर्ष से अधिक उम्र
सीओपीडी के लक्षण और संकेत:
सीने में जकड़न
पुरानी खांसी (साफ, सफेद, पीला या हरा बलगम)
बार-बार सांस के संक्रमण
लगातार थकान और ऊर्जा की कमी
अचानक वजन कम होना
सांस लेने में तकलीफ
टखनों, पैरों या टांगों में सूजन
घरघराहट
डॉक्टरों ने लोगों से अपील की कि सांस से जुड़ी किसी भी समस्या को नजरअंदाज न करें और समय पर जांच कराकर गंभीर बीमारियों से बचाव करें।






