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 “गर्भावस्था क्रूरता का बचाव नहीं”: दिल्ली हाईकोर्ट ने दी तलाक की मंजूरी, फैमिली कोर्ट का फैसला रद्द

नई दिल्ली, 25 नवंबर 2025 :- दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि पत्नी की गर्भावस्था और 2019 में हुआ गर्भपात, वैवाहिक जीवन के दौरान पति पर किए गए लगातार मानसिक उत्पीड़न को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते। अदालत ने पति को तलाक की डिक्री देते हुए फैमिली कोर्ट द्वारा तलाक से इनकार किए गए फैसले को रद्द कर दिया।

स्थायी क्रूरता को नहीं छुपा सकती अस्थायी सामंजस्य की अवधि

जस्टिस अनिल क्षेत्रपाल और जस्टिस रेनू भटनागर की खंडपीठ ने कहा कि बीच-बीच में हुए सामंजस्य के प्रयास, वर्षों तक जारी रही गाली-गलौज, धमकियों और परित्याग जैसे दुर्व्यवहार को माफ नहीं कर सकते।

अदालत के अनुसार पति द्वारा दी गई गवाही स्पष्ट और विश्वसनीय थी—जिसमें पत्नी द्वारा उस पर और उसकी दिव्यांग मां पर किए गए अपमान, आत्महत्या की धमकियां, वैवाहिक संबंधों से इनकार और बिना कारण मायके चले जाने जैसी बातें शामिल थीं।

इन सभी घटनाओं को मिलाकर अदालत ने पत्नी द्वारा पति के प्रति मानसिक क्रूरता साबित मानी, जो हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1)(ia) के तहत तलाक का आधार है।

दहेज और छेड़छाड़ के आरोप कोर्ट ने खारिज किए

पीठ ने पत्नी द्वारा लगाए गए दहेज उत्पीड़न और ससुर द्वारा छेड़छाड़ के आरोपों को खारिज कर दिया, यह देखते हुए कि पति द्वारा तलाक का मामला दायर करने से पहले कोई शिकायत, एफआईआर या सुरक्षा कदम नहीं उठाया गया था। अदालत ने कहा कि सभी आपराधिक शिकायतें बाद में दर्ज की गईं, जो आरोपों की विश्वसनीयता को कमजोर करती हैं और उन्हें “प्रतिक्रियात्मक” बताती हैं।

“गर्भावस्था के आधार पर वैवाहिक संबंध सामान्य मानना गलत”

हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट की इस दलील को अवैध बताया कि पत्नी की गर्भावस्था यह संकेत देती है कि वैवाहिक जीवन सामान्य था। अदालत ने कहा कि किसी एक स्थिर अवधि को आधार बनाकर पहले या बाद में हुए उत्पीड़न को नकारा नहीं जा सकता—खासकर जब रिकॉर्ड दिखाता है कि गर्भपात के बाद भी क्रूरता जारी रही।

“क्लीन हैंड्स” सिद्धांत का गलत उपयोग

अदालत ने स्पष्ट किया कि ‘क्लीन हैंड्स’ का सिद्धांत तभी लागू होता है जब याचिकाकर्ता स्वयं अपने गलत कामों से लाभ लेने की कोशिश कर रहा हो। चूंकि पति के खिलाफ किसी भी तरह का दुर्व्यवहार साबित नहीं हुआ, इसलिए फैमिली कोर्ट द्वारा इस आधार पर राहत से इनकार करना उचित नहीं था।

2020 से अलग रह रहे दंपति का विवाह समाप्त

अदालत ने यह भी कहा कि दंपति जनवरी 2020 से अलग रह रहा है और उनकी कोई संतान नहीं है, ऐसे में पुनर्मिलन की संभावना लगभग समाप्त हो चुकी है—विशेषकर तब जब यौन दुराचार जैसे गंभीर आरोप लगाए जा चुके हों।

अंत में हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट का फैसला रद्द करते हुए मार्च 2016 में संपन्न हुआ विवाह समाप्त कर दिया और कहा कि ऐसा मुकदमा केवल पक्षों की पीड़ा बढ़ाता है, जबकि संबंध स्पष्ट रूप से अपूरणीय रूप से टूट चुका है।

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