नई दिल्ली, 11 मार्च 2026: सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को एक बेहद भावुक और कानूनी रूप से महत्वपूर्ण मामले में फैसला सुनाते हुए 31 वर्षीय हरीश राणा को जीवन रक्षक प्रणाली हटाने की अनुमति दे दी। हरीश पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में थे। अदालत ने यह फैसला उनके बुजुर्ग माता-पिता की याचिका पर सुनाया।
बताया गया कि पंजाब यूनिवर्सिटी के होनहार छात्र रहे हरीश राणा वर्ष 2013 में एक हादसे का शिकार हो गए थे। वह चंडीगढ़ में एक पेइंग गेस्ट की चौथी मंजिल से गिर गए थे, जिससे उनके सिर में गंभीर चोटें आई थीं। हादसे के बाद से ही वह बिस्तर पर पड़े हुए थे।
उन्हें सांस लेने के लिए ट्रेकियोस्टॉमी ट्यूब और भोजन के लिए फीडिंग ट्यूब के सहारे रखा गया था। मेडिकल रिपोर्ट के अनुसार पिछले 13 वर्षों में उनकी स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ।
मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने फैसला सुनाते समय विलियम शेक्सपियर के प्रसिद्ध नाटक हैमलेट की पंक्ति “टू बी ऑर नॉट टू बी” का भी उल्लेख किया।
अदालत ने कहा, “डॉक्टर का कर्तव्य मरीज का इलाज करना है, लेकिन जब मरीज के ठीक होने की कोई उम्मीद ही न बची हो, तो यह कर्तव्य वहीं समाप्त हो जाता है।”
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि लाइफ सपोर्ट हटाने के लिए दो अहम आधार होने चाहिए—पहला, क्या यह हस्तक्षेप चिकित्सा उपचार की श्रेणी में आता है और दूसरा, क्या यह मरीज के सर्वोत्तम हित में है।
साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से अपील की है कि वह ‘पैसिव यूथनेशिया’ पर स्पष्ट कानून बनाने पर विचार करे। फिलहाल भारत में ऐसे मामलों में निर्णय लेने से पहले सुप्रीम कोर्ट को दो मेडिकल बोर्डों की राय लेना अनिवार्य होता है।






