चंडीगढ़, 02 फरवरी 2026 : पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में सोमवार को राज्य सरकार के कामकाज पर सवाल खड़े हो गए, जब अदालत को बताया गया कि खडूर साहिब से सांसद अमृतपाल सिंह को संसद के बजट सत्र में शामिल होने की अनुमति देने या न देने संबंधी कोई औपचारिक आदेश अब तक पारित नहीं किया गया है। यह जानकारी अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल सत्य पाल जैन ने मुख्य न्यायाधीश शील नागू की अध्यक्षता वाली डिवीजन बेंच के समक्ष दी।
अदालत अमृतपाल सिंह के तीसरे निवारक नजरबंदी आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई कर रही थी। कोर्ट को बताया गया कि अमृतपाल सिंह 23 मार्च 2023 से राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) के तहत निरंतर नजरबंद हैं और निर्वाचित सांसद होने के बावजूद जेल में हैं।
हाईकोर्ट ने इससे पहले 23 जनवरी को पंजाब सरकार को निर्देश दिया था कि वह संसद के आगामी बजट सत्र में शामिल होने के लिए अमृतपाल सिंह की अस्थायी रिहाई या पैरोल संबंधी याचिका पर सात कार्यदिवसों के भीतर फैसला ले। हालांकि, 2 फरवरी की सुनवाई में सरकार ने स्वीकार किया कि इस प्रतिनिधित्व पर अब तक कोई निर्णय नहीं लिया गया है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम की धारा 15 के तहत अस्थायी रिहाई देने की शक्ति “उचित सरकार” के पास होती है और इस मामले में यह शक्ति पंजाब सरकार के पास है। कोर्ट ने पंजाब सरकार के गृह एवं न्याय विभाग के गृह सचिव को 17 जनवरी की याचिका पर निर्णय लेने और याचिकाकर्ता तथा उसके वकील को तुरंत सूचित करने का आदेश भी दिया था, बावजूद इसके फाइल पर कोई ठोस प्रगति नहीं हुई है।
अमृतपाल सिंह की ओर से दलील दी गई कि वह वर्तमान सांसद हैं और संसद में उपस्थिति उनका संवैधानिक दायित्व है, इसलिए उन्हें बजट सत्र में भाग लेने के लिए अस्थायी रिहाई दी जानी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि उन्होंने अपनी मांग कई बार अधिकारियों के समक्ष रखी, जिसमें 17 जनवरी को गृह सचिव को भेजा गया पत्र भी शामिल है, लेकिन किसी स्तर पर कोई निर्णय नहीं लिया गया।
उल्लेखनीय है कि संसद का बजट सत्र दो चरणों में आयोजित किया जा रहा है—पहला 28 जनवरी से 13 फरवरी तक और दूसरा 9 मार्च से 2 अप्रैल तक। समय बीतने के साथ उनकी संवैधानिक भूमिका प्रभावित हो रही है।
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने यह अहम संवैधानिक प्रश्न भी उठाया कि क्या निवारक हिरासत में रखे गए किसी निर्वाचित सांसद को बिना स्पष्ट आदेश के अनिश्चित काल तक संसद में अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने से रोका जा सकता है, और क्या यह स्थिति लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप है। सरकार के “अब तक कोई आदेश नहीं” वाले बयान से स्पष्ट है कि अदालत के निर्देशों के बावजूद प्रशासनिक स्तर पर कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है।






