निकाशा लूथरा ने चंडीगढ़ प्रेस क्लब में आयोजित पत्रकार वार्ता के दौरान अपने नए उपन्यास ‘लॉस्ट एंड फाउंड इन कश्मीर’ के लोकार्पण की घोषणा की। इससे पहले निकाशा ‘डार्क ट्यूलिप्स’ नामक काव्य संग्रह और ‘फ्लावर्स इन हर रूम’ शीर्षक से पांच लघु नाटकों के संग्रह का लेखन कर चुकी हैं। इसके अलावा वह ‘अनकहे ख्वाब’ और ‘सहर की तलाश में’ फिल्मों का लेखन और निर्देशन भी कर चुकी हैं।
निकाशा लूथरा ने बताया कि 270 पृष्ठों के इस उपन्यास को लिखने में उन्हें लगभग दो वर्ष का समय लगा। पुस्तक का प्रकाशन अनंता प्रेस पब्लिकेशन द्वारा किया गया है। उन्होंने कहा कि इस उपन्यास की प्रेरणा उन्हें पहलगाम आतंकी हमले के बाद उत्पन्न भावनात्मक प्रभाव से मिली।
उन्होंने बताया कि यद्यपि यह एक काल्पनिक कहानी है, लेकिन इसमें हिंसा, दुख और संघर्ष से जुड़े मानवीय अनुभवों को संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत किया गया है। उपन्यास यह दर्शाता है कि असाधारण परिस्थितियां किस प्रकार आम लोगों के जीवन को पूरी तरह बदल देती हैं।
पत्रकार वार्ता के दौरान निकाशा ने पुस्तक के कुछ अध्यायों पर आधारित एक लघु फिल्म की झलक भी दिखाई। उन्होंने कहा कि पहलगाम की घटना ने उन्हें गहराई से प्रभावित किया था। इस घटना ने उन्हें केवल हमले के बारे में ही नहीं, बल्कि उन लोगों के बारे में भी सोचने के लिए प्रेरित किया जिनकी जिंदगी अचानक बदल गई, जिनके कई सपने अधूरे रह गए और जिनके मन का दर्द अक्सर अनकहा रह जाता है।
उपन्यास की कहानी कश्मीर की खूबसूरत वादियों की पृष्ठभूमि में बुनी गई है। इसके मुख्य पात्र हीर और कबीर हिंसा, दिल टूटने और अपनों को खोने के बाद उत्पन्न भावनात्मक परिस्थितियों का सामना करते हैं। उनके अनुभवों, यादों और संवादों के माध्यम से कहानी यह दर्शाती है कि एक त्रासदी किस प्रकार लोगों की पूरी दुनिया बदल सकती है।
निकाशा ने कहा कि कश्मीर की सुंदरता और पीड़ा एक साथ मौजूद हैं। वहां की वादियों में जहां अद्भुत प्राकृतिक सौंदर्य है, वहीं इतिहास, संघर्ष और अनकहे दुखों की गहरी छाप भी दिखाई देती है। यही कारण है कि इस उपन्यास में कश्मीर केवल एक स्थान नहीं, बल्कि एक महत्वपूर्ण पात्र के रूप में उभरकर सामने आता है।
उन्होंने कहा कि हिंसा और दुख जैसे संवेदनशील विषयों पर लिखते समय जिम्मेदारी और संवेदनशीलता बनाए रखना उनके लिए बेहद आवश्यक था। उनकी कोशिश रही कि कहानी में हिंसा को सनसनीखेज बनाने के बजाय पात्रों की भावनाओं और मानवीय पक्ष को प्रमुखता दी जाए।
निकाशा लूथरा ने कहा कि उनके लिए सबसे बड़ी सफलता यह होगी कि पाठक पुस्तक पढ़ने के बाद भी इसकी कहानी और भावनाओं को अपने साथ लेकर चलें। यदि यह उपन्यास किसी एक व्यक्ति में भी दूसरों के प्रति अधिक संवेदनशीलता और समझ विकसित कर सके, तो वह इसे अपनी लेखकीय सफलता मानेंगी। उन्होंने उम्मीद जताई कि भविष्य में कश्मीर को केवल हिंसा के संदर्भ में नहीं, बल्कि वहां के लोगों, संस्कृति, प्राकृतिक सौंदर्य और मानवीय मूल्यों के लिए भी याद किया जाएगा।






