लहरागागा, 21 जून 2026: कृषि लागत कम करने, मिट्टी की सेहत को बनाए रखने, खराब पानी के उचित प्रबंधन तथा रासायनिक उर्वरकों के संतुलित उपयोग को बढ़ावा देने के उद्देश्य से पंजाब कृषि विश्वविद्यालय, लुधियाना के दिशा-निर्देशों के तहत फार्म सलाहकार सेवा केंद्र, संगरूर द्वारा गांव भूटाल कलां (लहरागागा के निकट) में किसान प्रशिक्षण शिविर आयोजित किया गया।
शिविर के दौरान वरिष्ठ विस्तार वैज्ञानिक डॉ. अशोक कुमार गर्ग ने किसानों को मिट्टी परीक्षण आधारित उर्वरक प्रबंधन, धान और बासमती की पौध के लिए जैव उर्वरकों के टीकों के महत्व तथा धान में फास्फोरस उर्वरक के अनावश्यक उपयोग से बचने संबंधी वैज्ञानिक जानकारी दी। इस प्रशिक्षण शिविर में लगभग 30 किसानों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया।
डॉ. अशोक कुमार गर्ग ने किसानों को खराब पानी के उचित प्रबंधन के बारे में विस्तार से जानकारी देते हुए बताया कि अधिक लवणीय (नमक युक्त) पानी का लगातार उपयोग करने से भूमि की उर्वरता और स्वास्थ्य प्रभावित होता है। ऐसे पानी को कुछ मात्रा में नहरी पानी के साथ मिलाकर उपयोग किया जा सकता है। वहीं क्षारीय पानी, जिसमें सोडियम कार्बोनेट या बाइकार्बोनेट की मात्रा अधिक होती है, का उपयोग जिप्सम मिलाकर किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि ट्यूबवेल के पानी की जांच मिट्टी एवं जल परीक्षण प्रयोगशाला से अवश्य करानी चाहिए, ताकि पानी की गुणवत्ता और उसमें मौजूद दोषों का सही पता लगाया जा सके।
उन्होंने कहा कि उर्वरकों के संतुलित उपयोग से न केवल खेती की लागत कम होती है, बल्कि फसल उत्पादन और मिट्टी की सेहत में भी सुधार होता है। इस अवसर पर उन्होंने किसानों को मिट्टी के नमूने लेने की सही विधि भी विस्तार से समझाई और स्वयं नमूना लेकर उसका प्रदर्शन किया।
डॉ. गर्ग ने किसानों से धान और बासमती की फसल में डीएपी उर्वरक के अनावश्यक उपयोग से बचने तथा यूरिया का भी सीमित और संतुलित प्रयोग करने की अपील की। उन्होंने विशेष रूप से खेत की तैयारी (कद्दू करने) से पहले 2-3 बोरी यूरिया डालने की प्रथा से बचने की सलाह दी। साथ ही धान में जिंक की कमी को पूरा करने के लिए केवल अनुशंसित मात्रा में ही जिंक का प्रयोग करने की सलाह दी।
जैविक उर्वरकों के महत्व पर प्रकाश डालते हुए डॉ. गर्ग ने बताया कि धान की पौध पर लगाए जाने वाला एजोस्पाइरिलम टीका फसल की पैदावार बढ़ाने के साथ-साथ मिट्टी की जैविक गुणवत्ता सुधारने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
उन्होंने धान की नर्सरी तैयार करने के लिए अनुशंसित उर्वरकों तथा अन्य कृषि प्रबंधन संबंधी सुझावों की भी विस्तृत जानकारी दी। इस दौरान उन्होंने धान की नर्सरी में बौने पौधों के रोग की पहचान और रोकथाम संबंधी सिफारिशें साझा करते हुए किसानों को नियमित निगरानी करने के लिए प्रेरित किया।
शिविर की सफलता में सरदार हरसंत सिंह का विशेष योगदान रहा। कार्यक्रम के अंत में किसानों को प्रदर्शन के तौर पर एजोस्पाइरिलम टीके वितरित किए गए। कृषि साहित्य की बिक्री भी की गई। शिविर के दौरान किसानों द्वारा पूछे गए विभिन्न कृषि संबंधी प्रश्नों के वैज्ञानिक और व्यवस्थित ढंग से उत्तर दिए गए।






