वॉशिंगटन / तेहरान 18 जून 2026 : अमेरिका और ईरान के बीच प्रस्तावित शांति समझौते की रूपरेखा सार्वजनिक होने के बाद कई महत्वपूर्ण सवाल अब भी अनुत्तरित बने हुए हैं। 14 सूत्रीय इस मसौदा समझौते में युद्धविराम और हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही सामान्य बनाने पर जोर दिया गया है, लेकिन कई संवेदनशील मुद्दों पर स्पष्टता नहीं दी गई है।
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, अमेरिकी प्रशासन द्वारा जारी समझौते का मसौदा 800 शब्दों से भी कम का है। ऐसे में ईरान के परमाणु कार्यक्रम, क्षेत्रीय सुरक्षा व्यवस्था और अमेरिकी सैन्य बलों की वापसी जैसे अहम विषयों को विस्तार से शामिल नहीं किया गया है। माना जा रहा है कि इन मुद्दों पर बाद में अलग से विस्तृत चर्चा की जाएगी।
अमेरिकी प्रशासन के एक वरिष्ठ अधिकारी ने पत्रकारों को बताया कि अमेरिका, ईरान और उनके “सहयोगी पक्ष” लेबनान सहित पूरे क्षेत्र में तत्काल और स्थायी रूप से सैन्य कार्रवाई रोकने पर सहमत हुए हैं। हालांकि मसौदे में यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि “सहयोगी पक्षों” से आशय किन देशों या संगठनों से है। विशेष रूप से इजरायल और हिज़्बुल्लाह का नाम न होने से इस समझौते की प्रभावशीलता को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
समझौते में दोनों देशों ने एक-दूसरे की संप्रभुता का सम्मान करने और आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करने का वादा किया है। हालांकि यह स्पष्ट नहीं किया गया कि क्या अमेरिका ने ईरान में शासन परिवर्तन के लिए दबाव न बनाने की कोई प्रतिबद्धता भी जताई है।
हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य पर नियंत्रण और क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य मौजूदगी को लेकर भी मसौदा पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। विशेषज्ञों का मानना है कि इन विषयों पर अस्पष्टता भविष्य में समझौते के क्रियान्वयन के दौरान नई चुनौतियां पैदा कर सकती है।
विश्लेषकों के अनुसार, शांति समझौते की यह प्रारंभिक रूपरेखा तनाव कम करने की दिशा में एक सकारात्मक कदम है, लेकिन इसके सफल क्रियान्वयन के लिए कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर विस्तृत और स्पष्ट सहमति आवश्यक होगी।






