Monday, June 22, 2026
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भूटाल कलां में किसान प्रशिक्षण शिविर आयोजित, वैज्ञानिकों ने दी मृदा स्वास्थ्य और उर्वरक प्रबंधन की जानकारी

लहरागागा, 22 जून।

खेती की लागत कम करने, मिट्टी की सेहत बनाए रखने, खराब पानी के उचित प्रबंधन तथा रासायनिक उर्वरकों के संतुलित उपयोग को बढ़ावा देने के उद्देश्य से पंजाब कृषि विश्वविद्यालय, लुधियाना के दिशा-निर्देशों के तहत फार्म सलाहकार सेवा केंद्र, संगरूर द्वारा गांव भूटाल कलां (निकट लहरागागा) में किसान प्रशिक्षण शिविर का आयोजन किया गया।

शिविर के दौरान वरिष्ठ प्रसार वैज्ञानिक डॉ. अशोक कुमार गर्ग ने किसानों को मिट्टी परीक्षण आधारित उर्वरक प्रबंधन, धान एवं बासमती की पौध में जैव उर्वरकों के उपयोग तथा धान में फास्फोरस उर्वरक की अनावश्यक खपत से बचने संबंधी वैज्ञानिक जानकारी प्रदान की। इस प्रशिक्षण शिविर में लगभग 30 किसानों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया।

डॉ. गर्ग ने किसानों को खराब पानी के वैज्ञानिक प्रबंधन के बारे में विस्तार से जानकारी देते हुए बताया कि अधिक लवणता वाले पानी का लगातार उपयोग भूमि की उर्वरता और स्वास्थ्य को प्रभावित करता है। ऐसे पानी को नहरी पानी के साथ मिलाकर प्रयोग किया जा सकता है। वहीं, सोडियम कार्बोनेट या बाइकार्बोनेट युक्त क्षारीय पानी का उपयोग जिप्सम मिलाकर किया जा सकता है। उन्होंने किसानों को ट्यूबवेल के पानी की नियमित जांच मिट्टी-पानी परीक्षण प्रयोगशाला से करवाने की सलाह दी।

उन्होंने कहा कि उर्वरकों के संतुलित उपयोग से खेती की लागत घटाने के साथ-साथ फसल उत्पादन और मिट्टी की गुणवत्ता में भी सुधार होता है। इस अवसर पर उन्होंने मिट्टी के नमूने लेने की सही विधि का प्रदर्शन भी किया।

डॉ. गर्ग ने किसानों को धान और बासमती की फसल में डीएपी उर्वरक के अनावश्यक उपयोग से बचने तथा यूरिया का भी संतुलित मात्रा में प्रयोग करने की सलाह दी। उन्होंने विशेष रूप से खेत की तैयारी के दौरान अत्यधिक यूरिया डालने की प्रथा से बचने का आह्वान किया। साथ ही, धान में जिंक की कमी को दूर करने के लिए केवल अनुशंसित मात्रा में जिंक का उपयोग करने की सलाह दी।

जैव उर्वरकों के महत्व पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने बताया कि धान की पौध पर लगाया जाने वाला एजोस्पाइरिलम कल्चर न केवल उत्पादन बढ़ाने में सहायक है, बल्कि मिट्टी की जैविक गुणवत्ता सुधारने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

उन्होंने धान की नर्सरी तैयार करने के लिए अनुशंसित उर्वरकों और अन्य प्रबंधन संबंधी उपायों की जानकारी दी। साथ ही, नर्सरी में बौने पौधों की बीमारी की पहचान और रोकथाम के उपायों से भी किसानों को अवगत कराया तथा नियमित निगरानी की सलाह दी।

शिविर की सफलता में सरदार हरसंत सिंह का विशेष योगदान रहा। कार्यक्रम के अंत में किसानों को प्रदर्शन के लिए एजोस्पाइरिलम कल्चर वितरित किए गए तथा कृषि साहित्य की बिक्री भी की गई। इस दौरान किसानों द्वारा पूछे गए विभिन्न कृषि संबंधी प्रश्नों के वैज्ञानिक और व्यावहारिक समाधान भी दिए गए।

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