नई दिल्ली/वॉशिंगटन: अमेरिका में H-1B वीज़ा फीस बढ़ाने को लेकर ट्रंप प्रशासन का हालिया फैसला सियासी और कानूनी बहस का बड़ा मुद्दा बन गया है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के इस फैसले के खिलाफ अमेरिका के 20 राज्यों ने अदालत में याचिका दायर की है। राज्यों का कहना है कि यह फैसला गैरकानूनी है और इससे स्कूलों, अस्पतालों तथा अन्य जरूरी सेवाओं में स्टाफ की कमी और गंभीर हो जाएगी।
राज्यों का आरोप है कि ट्रंप प्रशासन का यह कदम अमेरिकी संविधान के खिलाफ है, क्योंकि कांग्रेस ने इतनी अधिक फीस लगाने की कभी अनुमति नहीं दी। पहले H-1B वीज़ा की फीस केवल सिस्टम चलाने की लागत तक सीमित रहती थी, जबकि अब कंपनियों को H-1B वीज़ा के लिए कुल मिलाकर 960 डॉलर से बढ़ाकर 7,595 डॉलर तक फीस चुकानी पड़ रही है।
इस मामले की अगुवाई कैलिफोर्निया के अटॉर्नी जनरल रॉब बोन्ता कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि ट्रंप प्रशासन के पास इतनी बड़ी फीस लगाने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है, इसलिए इस फैसले को रद्द किया जाना चाहिए।
राज्यों ने अदालत को बताया कि नई फीस से शिक्षकों की कमी और बढ़ेगी। आंकड़ों के अनुसार, 74 फीसदी स्कूलों ने माना है कि खाली पदों को भरने में पहले से ही कठिनाई हो रही है। इसके अलावा अस्पतालों में डॉक्टरों और मेडिकल स्टाफ की कमी और गंभीर हो सकती है। अनुमान है कि साल 2036 तक अमेरिका को करीब 86 हजार डॉक्टरों की कमी का सामना करना पड़ सकता है।
दरअसल, अमेरिका के स्वास्थ्य क्षेत्र में H-1B वीज़ा को बेहद अहम माना जाता है। साल 2024 में करीब 17,000 H-1B वीज़ा मेडिकल और हेल्थ सेक्टर के लिए जारी किए गए थे, जिनमें से लगभग आधे डॉक्टर और सर्जन थे।
इस याचिका में मैसाचुसेट्स, एरिज़ोना, कोलोराडो, कनेक्टिकट, डेलावेयर, हवाई, इलिनॉय, मैरीलैंड, मिशिगन, मिनेसोटा, नेवादा, नॉर्थ कैरोलाइना, न्यू जर्सी, न्यूयॉर्क, ओरेगन, रोड आइलैंड, वर्मोंट, वॉशिंगटन और विस्कॉन्सिन जैसे राज्य शामिल हैं।
गौरतलब है कि ट्रंप ने 19 सितंबर 2025 को एक आदेश जारी कर H-1B वीज़ा फीस बढ़ाने का ऐलान किया था, जिसे 21 सितंबर 2025 के बाद दाखिल होने वाली सभी H-1B वीज़ा अर्जियों पर लागू कर दिया गया। आदेश में डीएचएस के सचिव को यह अधिकार दिया गया कि किन अर्जियों पर फीस लगेगी और किसे छूट मिलेगी। अब यह मामला अदालत के सामने है और सभी की नजरें इस पर टिकी हैं कि कोर्ट ट्रंप सरकार के इस आदेश पर क्या फैसला सुनाती है।






