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पंजाबी यूनिवर्सिटी के अध्ययन में सामने आए टीबी मरीजों के सामाजिक व मानसिक संघर्ष, महिलाओं में दिखे अलग पैटर्न

पटियाला (पंजाब), 30 नवंबर 2025: पंजाबी यूनिवर्सिटी में हुए एक नए पीएच.डी. शोध ने पंजाब में तपेदिक (टीबी) मरीजों द्वारा झेले जा रहे महत्वपूर्ण सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और पारिवारिक संघर्षों को उजागर किया है। अध्ययन में पुरुष और महिला मरीजों के अनुभवों में स्पष्ट अंतर दिखा, साथ ही संयुक्त और एकल परिवारों के बीच समर्थन के अलग-अलग पैटर्न भी सामने आए। यह शोध सामाजिक कार्य विभाग के डॉ. हरप्रीत सिंह द्वारा प्रो. हरदीप कौर के मार्गदर्शन में किया गया।

प्रो. कौर के अनुसार, अध्ययन के लिए अमृतसर, गुरदासपुर, लुधियाना, जालंधर, संगरूर और पटियाला—इन छह उच्च-भार जिलों के 300 टीबी मरीजों का चयन किया गया। निष्कर्षों में पाया गया कि स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं और पारिवारिक मुद्दों में पुरुष व महिला मरीजों के बीच महत्वपूर्ण अंतर मौजूद हैं। संयुक्त और एकल परिवारों में रहने वाले मरीजों के अनुभव भी काफी भिन्न पाए गए।

मैदानी अध्ययन से एक ध्यान देने योग्य तथ्य यह सामने आया कि शादीशुदा महिला टीबी मरीजों को उपचार के लिए अक्सर उनके ससुराल की बजाय मायके वाले ले जाते थे। यह बीमारी से जुड़े सामाजिक व्यवहार और वैवाहिक ज़िम्मेदारियों की वास्तविकताओं पर प्रकाश डालता है।

कोपिंग रणनीतियों (Coping Strategies) में भी जिलों के बीच बड़ा अंतर देखने को मिला। सबसे अधिक 19 रणनीतियाँ संगरूर में दर्ज की गईं, जबकि पटियाला और अमृतसर में 7-7, लुधियाना में 2, और गुरदासपुर व जालंधर में केवल 1-1 रणनीति पाई गई।

डॉ. हरप्रीत सिंह ने बताया कि शोध का उद्देश्य मरीजों के टीबी संबंधी ज्ञान का मूल्यांकन, उनके सामने आने वाली समस्याओं की पहचान और बीमारी से निपटने की रणनीतियों का विश्लेषण करना था। अध्ययन में यह भी पाया गया कि अधिकांश मरीज बीमारी के बारे में पर्याप्त जानकारी रखते हैं—फेफड़ों का टीबी सबसे सामान्य रूप है और खांसी इसका मुख्य प्रसार माध्यम है। एक्स-रे और बलगम परीक्षण प्रमुख निदान साधन पाए गए। भारत सरकार की DOTS थेरेपी की व्यापक स्वीकार्यता को एक सकारात्मक प्रवृत्ति माना गया।

प्रो. कौर और डॉ. सिंह दोनों ने जोर दिया कि यह अध्ययन नीति-निर्माताओं, स्वास्थ्य प्रशासकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और टीबी रोकथाम से जुड़े एनजीओ के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

पंजाबी यूनिवर्सिटी के वाइस-चांसलर डॉ. जगदीप सिंह ने इस शोध की सराहना करते हुए कहा कि विश्वविद्यालय समाज की समझ को बेहतर बनाने वाले सार्थक अकादमिक कार्यों के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने कहा कि यह अध्ययन टीबी से जुड़ी डर, कलंक और गलतफहमियों को दूर करने में अहम भूमिका निभाएगा और अधिक प्रभावी हस्तक्षेप के लिए मार्ग प्रशस्त करेगा।

 

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